"जो की मुहम्मद से वफ़ा तूने...
ये जहां चीज़ क्या है,लौह-ए-कलम तेरे..
मुहर्रम .... इस्लामिक कैलेंडर हिजरी का वो मुक्कदश महीना जिसे माह -ए-शहादत का दर्जा मिला ......मुहर्रम गम और मातम का वो पाक महीना .....जिसने आज से 14 सौ साल पहले शहादत की वो मिसाल कायम की जिसे आदम जात के लिए आज तक भूलाना मुमकिन नही ...।
मुहर्रम .... मजहब -ए- इस्लाम का वो महीना है जिसने गुजरे तारिख मे कर्बला के मैदान को कब्रिस्तान बना दिया ।
(बकौल कर्बला की किताब के मुताबिक आज से 1400 साल पहले उस वक्त के तानाशाह यजीद का जुल्म गरीब और मजलुमों पर अपने परवान पर था ।
यजीद ने जुल्म और दहशत का वो माहौल बना रखा था जिसके तस्ववुर भर से रूह कापं जाए।
सन 60 हिजरी का वो साल सितम भरा था जब यजीद मजहब-ए-इस्लाम का खलीफा बन गया ।
यजीद ने हज़रत मुहमद साहब के नवासे हज़रत हुसैन को अपने कबीले में शामिल होने का हुक्म दिया कि वो उसके जालीम कबीले मे शामिल हो जाए ।
हज़रत इमाम हुसैन को यजीद का ये नापाक फरमान नागवर गुजरा।
हजरत इमाम हुसैन रज़ि. को उनकी वालिदा बीबी फातिमा से नेकी और सच्चाई की राह पर चलने की तालीम मिली थी। सिर्फ अपने फायदे के लिए किसी जालिम की गुलामी उन्हें कैसे गवारा होती।इसीलिए उन्होने उस सूबे को ही छोड़ देना ज्यादा बेहतर समझा और अपने खानदान के 123 लोगो के साथ मदिना से कुफा को तरफ रवाना हो गये ।
लेकिन उपर वाले को कुछ और ही मंजूर था। अल्लाह ताला अपने बंदो से जिंदगी के हर मोड़ पर इम्तेहान लेता है और इसी इम्तेहान से हज़रत इमाम हुसैन को गुजरने का घड़ी आ चुकी थी । जब यजीद के 41000 सिपाहिओं के सामने हज़रत इमाम हुसैन के सिर्फ 71 लोग सामना करने वाले थे और सबके जुबां पर एक ही बात थी कि कातिल से डरने वाले ए आसमां नही हम...सौ बार ले चुका है..तू इम्तेहां हमारा..
अल्लाह की मर्जी के आगे किसी की नही चलती शायद इसलिए मुहरर्म महिने की दसवी तारीख को हज़रत हुसैन के साथ 72 लोगो को शहादत का पाक दर्जा मिल गया जिसका गवाह बना कर्बला का ऐतिहासिक मैदान ।
मुहर्रम का मतलब खुद को सच्चाई और नेकी के रास्ते पर कुर्बान करना। जिस तरह हज़रत ईमाम अपने उसुल और ईमान को पक्का रखा और उसपर कायम रहते हुए किसी के आगे सर नही झुकाया इसी तरह हर इंसान को हमेशा सच्चाई की राह पर चलना चाहिए ।....
माह-ए- मुहरर्म हकिकत में ग़म का महिना है , इस महिने के शुरू के 10 दिनों में इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए रोज़ा रखा जाता है , इस महिने का एक रोज़ा 30 रोज़ो के बराबर की अहमियत रखता है । गरीबो को खाना खिलाना , शरबत पिलाना , कुरान की किरत करना इस महीने में अज़मत माना जाता है । कहीं ताजिए को जियारत होती है तो कहीं मातम का माहौल , कही ढ़ोल और ताशे बजते हैं तो कही नमाज़ और रोज़े की रवायत ।
तरिका बेशक अलग हो लेकिन हर इंसान के ज़ेहन में शहादत का जूनू साफ देखा जा सकता है ।
माहे-मुहरम ग़म और शहादत के महिना होता है इसलिए इसकी अकिदत में महज़ब-ए-ईस्लाम को मानने वाले अपने घरो में शहनाई नहीं बजाते ।
तरीका अलग हो ........ तहजीब अलग हो .........शहादत के बयां का तर्जुमा अलग हो ....... लेकिन हज़रत इमाम ने सच्चाई और नेकी पर चलने की ऐसी मिसाल कायम की थी जिसे कयामत तक इस कायनात को भुलाना.. आसां नहीं.................
किसी बड़े शाय़र ने शायद सही ही कहा था जो हजरत इमाम हुसैन की शहादत को बयां कर रही है कि..
तौहीद की अमानत सीने में है हमारे...
आता नहीं मिटाना.. नामों निशां तुम्हारा..।
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