विधि व्यवस्था अर्थात क़ानून व्यवस्था .सुनने में ज़रा आधुनिक शब्द लेकिन अपने आप में इतना महत्वपूर्ण जिससे स्वयं श्रृष्टि का निर्माता विधाता भी अछूता नहीं .
किसी राष्ट्र की सम्पन्नता वहां के विधि व्यवस्था से झलकती है.यह एक ऐसा माध्यम है जो किसी राष्ट्र को विकास रुपी शिखर पर पहुंचाता है वहीँ अगर इसका दुरुपयोग हो तो उस राष्ट्र को भ्रस्ताचार की खाई में भी धकेल देता है.
बात की जा रही है अपने देश भारत की जहाँ आज से ६१ वर्ष पूर्व हमारे कानून के निर्माताओं ने इसे पूर्ण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और हमारे समक्ष एक ऐसा संविधान पेश किया जो अपने आप में परिपक्व था ..
कार्यपालिका,न्यापालिका,और विधायिका ये हमारे संविधान के वो अस्तंभ है जिसपर हमारा राष्ट्र टिका हुआ है.
लेकिन ऐसे में सवाल यह आ गया की इस सुनियोजित व्यवस्था में भ्रष्टाचार रुपी दीमक क्यों लग गया जिससे इन अस्ताम्भों की नीव कमज़ोर पड़ने लगी?
किसी महान व्यक्ति ने कहा था की अनुशाशन ही देश को महान बनाता है.कथन सत्य है
लेकिन इसे माने कौन?
ग़लतियों की शुरुवात तो हम आम आदमी के मामूली से लोभ से होती है जब किसी के बहकावे में आकर हम किरिमनल ,अनपढ़ गवार को अपना प्रतिनिधित्व बनाकर संसद एवं विधानसभा में भेज देते हैं.यहाँ से ही भ्रष्टाचार की बीज पनपती है और हमारे समक्ष क़ानून व्यवस्था में चुनौती रुपी कटु शब्द आ जाता है ,जिस पर अंकुश लगाने के लिए हमें और हमारी सरकार को कुछ करना ही है.
स्वतंत्रता के बाद से अब तक हमारे संविधान में कुल ९४ संशोधन हो चुके हैं.जिसमे ज़मींदारी प्रथा को हटाने ,शिक्षा का अधिकार,सूचना का अधिकार जैसे महत्वपूर्ण तथ्य शामिल है,लेकिन इन सब के इलावा भी हमारे क़ानून के हाथ बंधे पड़े हैं.
हमारी लाचारी तो इसी बात से झलकती है की हम भ्रष्टाचार में शामिल होने पर राष्ट्रपति एवं मुख्य न्यायधीश के खिलाफ महाभियोग तो चला सकते हैं ,परन्तु एक सांसद के दोषी होने पर उसे बाहर का रास्ता दिखाने के लिए आग्रह करते हैं.ये तो ऐसा लगता है जैसे किसी को आसमान पर बिठा दिया ,और फिर वहीँ से ज़मीन पर पटक दिया.
ये एक छोटा सा उदाहरण है जो कही न कही हमें असहाय होने का ज्ञान देती है.
आज पूरा देश राष्ट्रमंडल खेल घोटाला,आदर्श सोसाइटी घोटाला कर्नाटक भूमि अधिग्रहण विदेशों में काला धन जैसे मामलों से घिरा पड़ा है.जिसमे सभी वर्ग के मंत्रियों से लेकर सैन्य नौकरशाह तक शामिल हैं,जिसने विश्व अस्तर पर हमारे कानून व्यवस्था पर सवालिया निशाँ लगा दिया है.
वैसे सुनने में बड़ा अच्छा लगता है की हमारा देश एक लोकतान्त्रिक देश है,जो जनता के लिए जनता के द्वारा है.
मगर
ये कहते हुए भी दुःख होता है की जब आम जनता का ही भरोसा सत्ता से उठ जाए तो उस देश का भविष्य धुंधला दिखे ये कहना ग़लत नहीं होगा.
ये हमारी विडम्बना हे है की आज अगर कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठा रहा है तो शक की सुई उसी की तरफ मोड़ी जा रही है.
क्या अगर कोई व्यक्ति कितना भी बुरा हो मगर उसकी मांग जायज़ हो तो क्या उसे बुरा कहने से उसकी मांग ग़लत हो जायेगी.
ज्यादा बताने की ज़रुरत नहीं है,क्योंकि क्योंकि सच तो यही है की हमेशा सच का दामन साफ़ ही होता है.
बस ज़रुरत है तो धैर्य की और जनता को जागरूक होने की वो किस तरफ अपने और अपने देश के भविष्य के लिए जाय.
अतः इन सभी पहलुओं पर हमें सोचने के साथ साथ इन चुनौतियों को स्वीकार करना होगा,वरण कुशाषण रुपी चिंता हमारे माथे पर ऐसा घाव देगी जिसे वक़्त चा कर भी नहीं मिटा पायेगा.....!!!
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