Saturday, 21 May 2011

आंतक पर कारवायी या देश को तमाचा?


हम भारतीय भी कितने मासूम और बेबस हैं.
एक तरफ हम अपने देश से ये उम्मीद लगाये बैठे हैं की वो अमेरिका की तर्ज़ पर अपने दुश्मनों से बदला लेगा,और दूसरी तरफ गृह मंत्रालय नपुंसक की तरह अपनी हे पीठ थपथपाने के लिये पकिस्तान सरकार को आतंकियों की सूँची थमा रही है.
वो काली सूँची भी ऐसी जिसने अपने ही देश का मुहं काला करवा दिया.
आश्चर्य होता है की देश की दो प्रमुख एजेंसी सी.बी.आई और ख़ुफ़िया विभाग ने ऐसी ग़लती कैसे कर दी! वजहुल कमर और फ़िरोज़ खान का नाम उस सूँची में शामिल होना कोई छोटी-मोटी ग़लती नहीं है जिसे कुछ निचले कर्मचारियों के निष्काषित किये जाने पर माफ़ कर दिया जाय.
हम पकिस्तान से क्या उम्मीद लगाये बैठे है की वो वाघा बोर्डर पर उन आतंकियों को लेकर आएगा और हमें सौंपते हुए कहेगा " की लीजिये अपने गुनाहगारों को"
व्यर्थ में वक़्त की बर्बादी.
शायद उन आतंकियों को पकड़ने का वो आधार एक ज़ोरदार ठहाके के साथ पाकिस्तानी कचड़े की शोभा बढ़ा रहा होगा.
क्या हमारे एजेंसी का ये नाकारापन देश में और आतंकियों को कुले सांड की तरह घुमने का शह नहीं देगा?
आंतंकवाद पर कारवायी करने के नाम पर मौन धारण करने वाली ये सरकार ने अभी ऐसा तमाचा देश को मारा है जिसकी गूँज अभी थमने वाली नहीं.

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