कॉलेज में छुट्टी मिली तो इस बार पटना जाने का मौका मिला,आनन-फानन में टिकट लेकर चल पड़ा जाने की ख़ुशी थी ही साथ साथ मन में एक सवाल भी उठ रहा था के इस बार क्या बदलाव देखने को मिलेगा?
प्रश्न स्वाभाविक था क्योंकि कुंठित हो चूका बिहार अब विकास की राह पर अग्रसर था.
पटना जं. के बाहर निकला तो नज़ारा ऐसा था मानो मै किसी तीर्थ स्थान पर पहुँच गया हूँ.मैंने कुछ ज्यादा कह दिया तो माफ़ी चाहूँगा ,मगर महज़ ३०० मीटर के दायरे में एक भव्य विशाल महाबली हनुमान की मंदिर,एक ऊँची मीनार वाली मस्जिद और अब एक अति सुन्दर बोद्ध मंदिर भी नज़र आये तो कोई भी अचम्भा खा जाए.
ये स्वागत द्वार या यूँ कहे सूचक है बिहार की एकता और सदभावना का.
किसी ज़माने में जंगल राज कहे जा रहे राज्य की राजधानी की रौनक ही कुछ और थी.हर तरफ साफ़ सफ़ाई और रौशनी की चकाचौंध आँखों को आकर्षित कर रही थी.
कही कही पर "क्लीन पटना ग्रीन पटना" जैसे स्लोगन भी पढने को मिल रहे थे,हालांकि ये पहले भी लिखे होते थे मगर फर्क सिर्फ इतना था की इस पर पान और गुटके का टीका लगा होता था ताकि नज़र न लगे.
शायद बात हो रही है उस बदलते बिहार की जिसके लिए कुछ साल पहले वक़्त जैसे ठहर सा गया था और वहां की जनता ने बदलाव की आशा करनी भी छोड़ दी थी ..!
मगर बदलाव लाता भी तो कौन??
बीबीसी के एक कार्यक्रम में तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से पूछा जाता है कि आप मुख्यमंत्री बन गयी हैं..कैसे संभालेंगी राज्य को???
इस पर उनका जवाब बड़ा शर्मनाक आता है
"जिस तरह से बचपन में रोटी बनाना और बकरी चराना सीखे थे वैसिये सीख जाएंगे ई भी "
अब ज़रा सोचिये जब राज्य का मुखिया ही ऐसी कुपोषित मानसिकता का आदमी हो जिसे एक राज्य चलाना और बकरी चराने का अन्तर प्राप्त न हो उससे किसी अच्छे कार्य कि आशा भी करना मुर्खता थी.
कारणवश!
हर तरफ कुशाशन ,बदतमीज़ी ,रंगदारी!
आपकी कार कितनी भी अच्छी क्यों न हो गांधी सेतु पर लाठी दिखाकर हे रोका जाता था,आपके पास ट्रेन में ए .सी का टिकेट क्यों ना हो मगर एक बेटिकट ग्वाला आपके साथ सफ़र का आनंद लेगा,क्यों कि दुसरे दर्जे में गर्मी से उसका दूध जो फट जाता.
बिहार भ्रस्टाचार के ऐसे भवर में फंसता जा रहा था जिससे निकलना अब नामुमकिन सा लग रहा था.
लेकिन कहते है न कभी न कभी पाप का घड़ा ज़रूर भरता है,शायद वो समय आ गया था तभी लालू राज का अंत समीप लगने लगा.
और आशाहीन हो चुके बिहार को नितीश कुमार जैसा प्रभावी नेता मिला ,जिन्होंने धर्म और जाती कि राजनीति छोड़ विकास का मुद्दा उठाया .
"वक़्त बदला ,हालात बदले,और बदला सारा बिहार"
हर तरफ विकास कि बातें होने लगी,गाव,शहर में जर्जर हो चुके सड़कों का पूर्ण रूप से निर्माण हुआ,जानकार सही कहते हैं के किसी राज्य का पहला आकर्षण उस राज्य का यातायात होता है.
वो बदलाव यहाँ अब देखने को मिल रहा है. .
जो सफ़र टूटी सड़क के कारण ३ घंटे का होता था वो अब महज़ ४५ मिनट में पूरा किया जा सकता है.
आपके पास अगर गाडी अच्छी हो तो अब १२०-१३० किमी प्रति घंटा की रफ़्तार पाना अब मुक्मिन है,यकीन ना आये तो कभी एन ,एच ३१ पर आकर देखे.
गावों के बच्चों को मुफ्त कपडे.किताब ,भोजन और यहाँ तक की साईकिल भी दी गयी.जिसका असर अब साफ़ देख जा सकता है,बच्चे अब खुद स्कुल जाना चाहते हैं.और इससे शिक्षा का स्तर भी बढ़ रहा है
गावं में बिजली पहुंचाने के लक्ष्य से एक कदम आगे जाकर इन्टरनेट की सुविधा मुहैया करायी जा रही है.
बिहार की तरफ उलट कर न देखने वाले व्यापारी अब वहां कारखाना लगा रहे हैं,जिससे वहा रोज़गार को बढ़ावा मिल रहा है.
कूल मिलाकर कहा जाए तो बेशक यही वो बदलाव है,जिसे देखने के लिए ना जाने कब से यहाँ की आँखे तरस रही थी.
इस सारे कार्य का श्रेय नितीश जी को ही जाता है जिन्होंने ये बदलाव लाकर एक मिसाल क़ायम की.
काश दुसरे राज्य के नेता भी धर्म की राजनीती छोड़ विकास की राजनीती का पाठ नितीश से पढ़े तो अपने देश की तस्वीर ही कुछ अलग होगी.
बस इस वक़्त तो ज़ेहन में एक बड़े आदमी की कही बात याद आ रही है जो बिहार आज कह रहा है
"जिस तरह रात को चीरता हुआ आता है आफताब,देखने वाले देख कैसे होता है इन्क़लाब"...............!!!!!
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