मनुष्य एक संवेदनशील प्राणी है,उसके सोचने की शक्ति और उसके भावना व्यक्त का अंदाज़,एक दुसरे के सुख दुःख में सह्तोग आदि उसे अन्य जीव से भिन्न करता है.
इसके जीवन में आये दिन कुछ न कुछ घटता ही रहता है,कुछ सुखद आनंद देता है तो कुछ बातें और यादें एक घाव की तरह उसके ज़ेहन में दाग़ छोड़ जाती है.
कुछ ऐसा ही घाव ब्रिटिश शासको ने जलियांवाला बाग़ काण्ड में दिया था,तो कुछ बटवारे के वक़्त तो कुछ सिख दंगो ने तो कुछ २००२ के गुजरात दंगे ने.
ये कुछ ऐसे दर्द है जिसे हम चाह कर भी नहीं भुला पाते.
इन दिनों दारूल-उलूम के कुलपति ग़ुलाम मोहम्मद वस्तान्वी को उनके पद से हटा देना काफी चर्चा का विषय बना हुआ है.
मुस्लिम समुदाय द्वारा उच्च अधिकार प्राप्त समिति मज्लिश-इ-शूरा के इस फैसले का कुछ लोग निंदा कर रहे है तो कुछ सराहते थक नहीं रहे.
ये भारतवर्ष है,यहाँ हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का पूरा हक़ है,और कहना भी चाहिए.मै इसका स्वागत करता हूँ.
मगर अक्सर सुनते आया हूँ की जब आप किसी बड़े ओहदे पर होते हैं तो आपके साथ कई जिम्मेदारियां भी होती है.
आपका हर कथन सुलझा,और एक कुंबे को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिये.
शायद ये कुछ बातें वस्तान्वी साहेब मोदी की तारीफ़ करते वक़्त भूल गए की वो किस पद पर आसीन है और इसका क्या असर हो सकता है.
निश्चित तौर पर हमें पिछली बातों को भूलकर आगे का सोचना चाहिये,और कुछ अलग करना चाहिए.
ये सारे कथन सुनने में बड़ा आदर्श वादी लगता है,और कोई भी इसे सुनकर कहने वाले का पीठ थप्थपाएगा ही .
मगर कहने और सहने में फर्क होता है,जिस पर बीती है उससे जाकर कोई पूछे इस दर्द का एहसास.
वैसे वक़्त हर ग़म को भूला देता है,और गुजरात दंगे के पीड़ित इसे भूल भी रहे थे.
लेकिन ऐसे स्थिति में वस्तान्वी साहेब के मुह से इस नरसंहार के मुखौटे की तारीफ़,उस दंगे के पीड़ित के ज़ख्म पर नमक छिड़कने से कम नहीं है.
कैसे कोई बेटा अपने आँखों के सामने माँ-बाप के टुकड़े करने वाले को भूल जाए,?
कैसे कोई मूक दर्शक बनी उस पुलिस को भूल जाए जो वहां तमाशा देख रही थी.?
कैसे किओ भूल जाए बाबू बजरंगी की वो अमानवीय हरकत जब उसने एक नवजात शिशु को अपनी तलवार में घोप कर यह कहा की मुझे अपने आप में महाराणा प्रताप की अनुभूति प्राप्त हो रही है.
इंसानियत को शर्म सार कर देने वाले इस वाकिये के बावजूद जस्टिस मेहता ने उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया.
पता नहीं और कितने ऐसे बाबू आराम से अपना जीवन बिता रहे है.
पर उन दुखड़ों का आज क्या?जिन्होंने ये नज़ारा देखा है और सह रहे हैं.
नतीजा आज किसी से छुपा नहीं है.खुद एस.आई.टी. ने भी मुख्यमंत्री महोदय को क्लीन चीट दे दिया.
बहरहाल
ग़लती सभी से होती है,शायद इस लिए क्षमा या पश्चाताप नाम भी कोई चीज़ होती है.
मगर कोई मुझे एक इकलौता उदहारण देगा जब मोदी ने स्वयं गुजरात दंगे पर माफ़ी मांगी हो.
नहीं!
क्योंकि वो आज भी अडिग हैंकि उन्होंने जो किया सही किया.
हम जनरल डायर की तारीफ़ यह कहकर नहीं कर सकते की वो बहुत अछे इंसान थे,उन्होंने जलियांवाला काण्ड में हजारो लोगों को मारा जिससे हमें प्रेरणा मिली की हमें आज़ादी मिलनी चाहिए.
ये तो शहीदों के खून को नालें में बहाने के समान है.
आज भी वहाँ की दीवारों पर गोलियों के निशाँ देख कर रूह सिहर उठता है.
क्या उसे हम भूल सकते हैं.?
कुछ ऐसा ही वाकिया मोदी जी के साथ हुआ.
जिनकी धरती पर जब सबकुछ मिट गया,और आज किसी ने आशियाना बना लिया तो उसे विकास का नाम दे दिया.
आज गुजरात २८ राज्यों में नंबर १ के खिताब के साथ ८-१० % की विकास दर के साथ आगे बढ़ रहा है.
इससे वहां की जनता (हिन्दू,मुस्लिम,सिख ,इसाई ) का विकास हुआ है,नाकि सिर्फ मुसलमान का.
मुस्लिम की हालत में सुधार किसे कहते हैं.?
गुजरात में मुस्लिमो के हक के लिये ना तो एक मानिओरिटी कमीशन है,ना तो एक हज कमिटी है.
ना ही मुस्लिम संस्थाओं द्वारा राष्ट्रीय अस्तर पर मान्य डिग्री से किसी अच्छे पोस्ट पर दाखिला हो पाता है.
क्या इसे ही उध्हार कहते हैं. या पूर्ण विकास?
विकास का समर्थक मै भी हूँ.
और कही भी विकास की बात होती है तो दिल खुश होता है.
परन्तु जो व्यक्ति ग़लत है,और उसकी तारीफ़ हो तो ऐसी मानसिकता वाले लोंगों को और शह मिलती है.
और इसे रोकना कोई गुनाह नहीं.
वैसे भी भाषण बाज़ी और किसी का दर्द दिल से महसूस करने में फर्क होता है,ये मेरी सोंच है.
चाहे वो किसी भी धर्म का हो.
क्योंकि दिल से निकली आह किसी का भी घर जला सकती है.
(सभी अपने अपने विचार व्यक्त करे,मै उसका स्वागत करता हूँ,)
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