Friday, 24 June 2011

ज़रा ग़ौर करने वाली बात!!

बचपन से सुनता  आया हूँ की  इश्वर प्रेम का और श्रधा का भूका होता है हीरे और जवाहारात का नहीं.,मगर पिछले दिनों जब दो महीने बाद भगवान् सत्य साईं की मृत्यु के बाद जब उनका विशेष कक्ष खोला गया तो हमेशा से सुनते  उस कथन पर संदेह होने लगा.
कयास तो यही लगाया जा रहा था के कुछ न कुछ चौकाने वाला दृश्य होगा ही,और ठीक उसी तरह आशा के अनुरूप खबर वैसी हे दिखी. ३८ करोड़ की संपत्ति ,हीरे जवाहारात,विदेशी मुद्रा आदि का भंडार उस बायोमैट्रिक कक्ष में मौजूद था. 
अब इसे भगवान् की श्रधा कहे या उनका पूँजी प्रेम ये समझ से बाहर है.
उनके इस कक्ष को उनके उँगलियों के निशाँ से हे खोला जा सकता था,और उनके करीबी सत्यजीत को छोड़कर और किसी को जाने की इजाज़त नहीं थी.
खैर जो भी हो,सच तो यही है की बाबा के जीवन में विवादों के साथ साथ उनका चमत्कारी तेज भी बढ़ता रहा.
शायद इसलिए उनकी मृत्य की खबर से पुरे विश्व में शोक की लहर दौड़ गयी और  आज भी उनकी तस्वीर को रखकर उनके भक्त  पूजा अर्चना  करते हैं.

बहरहाल मै बाबा की विश्वश्नियता पर कोई सवाल नहीं उठाना  चाहता !
मुझे इस समय कार्ल मार्क्स की पढ़ी हुई एक बात याद आ रही है की "धर्म एक अफीम की तरह होता है जो थोड़ी देर के लिए राहत देती है."
आज हर व्यक्ति अपने आप में परेशान  या यूं कहिये शान्ति की चाह में अँधा हो चूका है.
और इसका फ़ायदा नित्य प्रतिदिन उपज रहे बाबा और ट्रस्ट उठा रहे हैं.
श्रधा की आड़ में भ्रस्ट राजनेता और उद्योगपति इन ट्रस्टों में अपना पैसा जमा कर देते हैं .जहा उनका धन महफूज़ रहता है.
इससे, जहाँ एक ओर टैक्स की चोरी खुले आम घर में हे होती है,तो दूसरी तरफ इस धन के जायज़ नाजायज़ होने की राजनीती में मार काट,भड़काऊ भाषण,अपराध ,खून खराबा अलग.
आम जनता की आँखों  पर इस तरह से धर्म का पर्दा डाल दिया जाता है की वो क्या सही क्या ग़लत इस पर विचार हे नहीं कर सकती है.
कारणवश
आज धर्म ,धर्म ना रहकर पैसे छिपाने का बैंक और राजनीति की कारखाना होता जा रहा है.
दुर्भाग्यपूर्ण ये है की इस सुनियोजित बहस में पड़कर देश और जनता का समय तो बर्बाद होता हे है साथ साथ मुख्य कार्य पीछे छूट जाते हैं.
पहले के मुकाबले आज जनता का विवेक कही जागा है,बस ज़रुरत है तो उसे निखारने की .
बेहतर यही होगा की किसी भी चीज़ खासकर धर्म में अँधा लीन नहीं होना चाहिए,और क्या सही क्या ग़लत का फर्क देखने का ज़ेहन रखना होगा .
इससे अपना भी भला होगा और शायद देश का भी कुछ भला हो जाय!!!!

Saturday, 18 June 2011

कानून व्यवस्था और चुनौती


विधि व्यवस्था अर्थात क़ानून व्यवस्था .सुनने में ज़रा आधुनिक शब्द लेकिन अपने आप में इतना महत्वपूर्ण जिससे स्वयं श्रृष्टि का निर्माता विधाता भी अछूता नहीं .
किसी राष्ट्र की सम्पन्नता वहां के विधि व्यवस्था  से झलकती है.यह एक ऐसा माध्यम  है जो किसी राष्ट्र को विकास रुपी शिखर पर पहुंचाता है वहीँ अगर इसका दुरुपयोग हो तो उस राष्ट्र को भ्रस्ताचार की खाई में भी धकेल देता है.
बात की जा रही है अपने देश भारत की जहाँ  आज से ६१ वर्ष पूर्व हमारे कानून के निर्माताओं ने इसे पूर्ण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और हमारे समक्ष एक ऐसा संविधान पेश किया जो अपने आप में परिपक्व था ..
कार्यपालिका,न्यापालिका,और विधायिका ये  हमारे संविधान के वो अस्तंभ है जिसपर हमारा राष्ट्र टिका हुआ है.
लेकिन ऐसे में सवाल यह आ गया की इस सुनियोजित व्यवस्था में भ्रष्टाचार रुपी दीमक क्यों लग गया जिससे इन अस्ताम्भों की नीव कमज़ोर पड़ने लगी?
किसी महान व्यक्ति ने कहा था की अनुशाशन ही देश को महान बनाता है.कथन सत्य है 
लेकिन इसे माने कौन?
ग़लतियों की शुरुवात तो हम आम आदमी के मामूली से लोभ से होती है जब किसी के बहकावे में आकर हम किरिमनल ,अनपढ़ गवार को अपना प्रतिनिधित्व बनाकर संसद एवं विधानसभा में भेज देते हैं.यहाँ से ही भ्रष्टाचार की बीज पनपती है और हमारे समक्ष क़ानून व्यवस्था में चुनौती रुपी कटु शब्द आ जाता है ,जिस पर अंकुश लगाने के लिए हमें और हमारी सरकार को कुछ करना ही है.
स्वतंत्रता के बाद से अब तक हमारे संविधान में कुल ९४ संशोधन हो चुके हैं.जिसमे ज़मींदारी प्रथा को हटाने ,शिक्षा का अधिकार,सूचना का अधिकार जैसे महत्वपूर्ण तथ्य शामिल है,लेकिन इन सब के इलावा भी हमारे क़ानून के हाथ बंधे पड़े हैं.
हमारी लाचारी तो इसी बात से झलकती है की हम भ्रष्टाचार में शामिल होने पर राष्ट्रपति एवं मुख्य न्यायधीश के खिलाफ महाभियोग तो चला सकते हैं ,परन्तु एक सांसद के दोषी होने पर उसे बाहर का रास्ता दिखाने के लिए आग्रह करते हैं.ये तो ऐसा लगता है जैसे किसी को आसमान पर बिठा दिया ,और फिर वहीँ से ज़मीन पर पटक दिया.
ये एक छोटा सा उदाहरण है जो कही न कही हमें असहाय होने का ज्ञान देती  है.
आज पूरा देश राष्ट्रमंडल खेल घोटाला,आदर्श सोसाइटी घोटाला कर्नाटक भूमि अधिग्रहण विदेशों में काला धन जैसे मामलों से घिरा पड़ा है.जिसमे सभी वर्ग के मंत्रियों से लेकर सैन्य नौकरशाह  तक शामिल हैं,जिसने विश्व अस्तर पर हमारे कानून व्यवस्था पर सवालिया निशाँ लगा दिया है.
वैसे सुनने में बड़ा अच्छा लगता है की हमारा देश एक लोकतान्त्रिक देश है,जो जनता के लिए जनता के द्वारा है.
मगर
ये कहते  हुए भी दुःख होता है की जब आम जनता का ही भरोसा सत्ता से उठ जाए तो उस देश का भविष्य धुंधला दिखे ये कहना ग़लत नहीं होगा.
ये हमारी विडम्बना हे है की आज अगर कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठा रहा है तो शक की सुई उसी की तरफ मोड़ी जा रही है.
क्या अगर कोई व्यक्ति कितना भी बुरा हो मगर उसकी मांग जायज़ हो तो क्या उसे बुरा कहने से उसकी मांग ग़लत हो जायेगी.
ज्यादा बताने की ज़रुरत नहीं है,क्योंकि क्योंकि सच तो यही है की हमेशा सच का दामन साफ़ ही होता है.
बस ज़रुरत है तो धैर्य की और जनता को जागरूक होने की वो किस तरफ अपने और अपने  देश के भविष्य के लिए जाय.

अतः इन सभी पहलुओं पर हमें सोचने के साथ साथ इन चुनौतियों को स्वीकार करना होगा,वरण कुशाषण रुपी चिंता हमारे माथे पर ऐसा घाव देगी जिसे वक़्त चा कर भी नहीं मिटा पायेगा.....!!!

Saturday, 21 May 2011

आंतक पर कारवायी या देश को तमाचा?


हम भारतीय भी कितने मासूम और बेबस हैं.
एक तरफ हम अपने देश से ये उम्मीद लगाये बैठे हैं की वो अमेरिका की तर्ज़ पर अपने दुश्मनों से बदला लेगा,और दूसरी तरफ गृह मंत्रालय नपुंसक की तरह अपनी हे पीठ थपथपाने के लिये पकिस्तान सरकार को आतंकियों की सूँची थमा रही है.
वो काली सूँची भी ऐसी जिसने अपने ही देश का मुहं काला करवा दिया.
आश्चर्य होता है की देश की दो प्रमुख एजेंसी सी.बी.आई और ख़ुफ़िया विभाग ने ऐसी ग़लती कैसे कर दी! वजहुल कमर और फ़िरोज़ खान का नाम उस सूँची में शामिल होना कोई छोटी-मोटी ग़लती नहीं है जिसे कुछ निचले कर्मचारियों के निष्काषित किये जाने पर माफ़ कर दिया जाय.
हम पकिस्तान से क्या उम्मीद लगाये बैठे है की वो वाघा बोर्डर पर उन आतंकियों को लेकर आएगा और हमें सौंपते हुए कहेगा " की लीजिये अपने गुनाहगारों को"
व्यर्थ में वक़्त की बर्बादी.
शायद उन आतंकियों को पकड़ने का वो आधार एक ज़ोरदार ठहाके के साथ पाकिस्तानी कचड़े की शोभा बढ़ा रहा होगा.
क्या हमारे एजेंसी का ये नाकारापन देश में और आतंकियों को कुले सांड की तरह घुमने का शह नहीं देगा?
आंतंकवाद पर कारवायी करने के नाम पर मौन धारण करने वाली ये सरकार ने अभी ऐसा तमाचा देश को मारा है जिसकी गूँज अभी थमने वाली नहीं.

Thursday, 19 May 2011

"वक़्त बदला,हालात बदले और बदला वो बिहार"


कॉलेज में छुट्टी मिली तो इस बार पटना जाने का मौका मिला,आनन-फानन में टिकट लेकर चल पड़ा जाने की ख़ुशी थी ही  साथ साथ मन में एक सवाल  भी उठ रहा था के इस बार क्या बदलाव देखने को मिलेगा?
प्रश्न स्वाभाविक था क्योंकि कुंठित हो चूका बिहार अब विकास की राह पर अग्रसर था.
पटना जं. के बाहर निकला तो नज़ारा ऐसा था मानो मै किसी तीर्थ स्थान पर पहुँच  गया हूँ.मैंने कुछ ज्यादा कह दिया तो माफ़ी चाहूँगा ,मगर महज़ ३०० मीटर के  दायरे में एक भव्य विशाल महाबली हनुमान की मंदिर,एक ऊँची मीनार वाली मस्जिद और अब एक अति सुन्दर बोद्ध मंदिर भी नज़र आये तो कोई भी अचम्भा खा जाए.
ये स्वागत द्वार या यूँ कहे सूचक है  बिहार की एकता और सदभावना का.
किसी ज़माने में जंगल राज कहे जा रहे राज्य की राजधानी की रौनक ही  कुछ और थी.हर तरफ साफ़ सफ़ाई और रौशनी की चकाचौंध आँखों को आकर्षित कर रही थी.
कही कही पर "क्लीन पटना ग्रीन पटना" जैसे स्लोगन भी पढने को मिल रहे थे,हालांकि ये पहले भी लिखे होते थे मगर फर्क सिर्फ इतना था की इस पर पान और गुटके का टीका लगा होता था ताकि नज़र न लगे.

शायद बात हो रही है उस बदलते बिहार की जिसके लिए कुछ साल पहले वक़्त जैसे ठहर सा गया था और वहां  की जनता ने बदलाव की आशा करनी भी छोड़ दी थी ..!
मगर बदलाव लाता  भी तो कौन??
बीबीसी के एक कार्यक्रम में तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से पूछा जाता है कि आप मुख्यमंत्री बन गयी हैं..कैसे संभालेंगी राज्य को???
इस पर उनका जवाब बड़ा शर्मनाक आता है
 "जिस तरह से बचपन में रोटी बनाना और बकरी चराना सीखे थे वैसिये सीख जाएंगे ई भी "
अब ज़रा सोचिये जब राज्य का मुखिया ही ऐसी कुपोषित मानसिकता का आदमी हो जिसे एक राज्य चलाना  और बकरी चराने का अन्तर प्राप्त न हो उससे किसी अच्छे कार्य कि आशा भी करना मुर्खता थी.
कारणवश!
हर तरफ कुशाशन ,बदतमीज़ी ,रंगदारी!
आपकी कार कितनी भी अच्छी क्यों न हो गांधी सेतु पर लाठी दिखाकर हे रोका जाता था,आपके पास ट्रेन में ए .सी का टिकेट क्यों ना हो मगर एक बेटिकट ग्वाला आपके साथ सफ़र का आनंद लेगा,क्यों कि दुसरे दर्जे में गर्मी से उसका दूध जो फट जाता.
बिहार भ्रस्टाचार के ऐसे भवर में फंसता जा रहा था जिससे निकलना अब  नामुमकिन सा लग रहा था.

लेकिन कहते है न कभी न कभी पाप का घड़ा ज़रूर भरता है,शायद वो समय  आ गया था तभी लालू राज का अंत समीप लगने लगा.
और आशाहीन हो चुके बिहार को नितीश कुमार जैसा प्रभावी नेता मिला ,जिन्होंने धर्म और जाती कि राजनीति छोड़ विकास का मुद्दा उठाया .
"वक़्त बदला ,हालात बदले,और बदला सारा बिहार"
हर तरफ विकास कि बातें होने लगी,गाव,शहर में जर्जर हो चुके  सड़कों  का पूर्ण रूप से निर्माण हुआ,जानकार सही कहते हैं के किसी राज्य का पहला आकर्षण उस राज्य का यातायात होता है.
वो बदलाव यहाँ अब देखने को मिल रहा है. .
जो सफ़र टूटी सड़क के कारण ३ घंटे का होता था वो अब महज़ ४५ मिनट में पूरा  किया जा सकता है.
आपके पास अगर गाडी अच्छी हो तो अब १२०-१३० किमी प्रति घंटा की रफ़्तार पाना अब मुक्मिन है,यकीन ना आये तो कभी एन ,एच  ३१ पर आकर देखे.
गावों के बच्चों को मुफ्त कपडे.किताब ,भोजन और यहाँ तक की साईकिल भी दी गयी.जिसका असर अब साफ़ देख जा सकता है,बच्चे अब खुद स्कुल जाना चाहते  हैं.और इससे शिक्षा का स्तर भी बढ़ रहा है 
गावं में बिजली पहुंचाने  के लक्ष्य से एक कदम आगे जाकर इन्टरनेट की सुविधा  मुहैया करायी जा रही है.
बिहार की तरफ उलट कर न देखने वाले व्यापारी अब वहां कारखाना लगा रहे हैं,जिससे वहा रोज़गार को  बढ़ावा मिल रहा है.
कूल मिलाकर कहा जाए तो बेशक यही वो बदलाव है,जिसे देखने के लिए ना जाने कब से यहाँ की आँखे तरस रही थी.
इस सारे कार्य का श्रेय नितीश जी को ही  जाता है जिन्होंने ये बदलाव लाकर एक मिसाल क़ायम की.
काश दुसरे राज्य के नेता  भी धर्म की राजनीती छोड़ विकास की राजनीती का पाठ नितीश से पढ़े तो अपने देश की तस्वीर ही  कुछ अलग होगी.
बस इस वक़्त तो  ज़ेहन में एक बड़े आदमी की कही  बात याद आ रही है जो बिहार आज कह रहा है 
  "जिस तरह रात को चीरता हुआ आता है आफताब,देखने वाले देख कैसे होता है इन्क़लाब"...............!!!!!

Wednesday, 18 May 2011

अमर वार्ता में विष क्यों मिला दिया गया?



एक सुबह जब उठा तो अखबार न मिला ,सोचा इन्टरनेट पर हे खबर पढ़ लूं.
राहुल गाँधी और भट्टा परसौल के हंगामे के इलावा  "मोहल्ला लाइव" वेबसाइट पर नज़र डाली.
पहले ही  पृष्ट पर दो ख़बरों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया.
पहला- नवभारत ने अमर वाणी को अपने ऑनलाइन पृष्ट से हटायी,और दूसरी
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सुनिए एक दलाल नेता की "अमर" वार्ता.

अपने ब्लॉग में अविनाश जी ने बड़े ही रोचक अंदाज़ पुरे टेप की व्याख्या की है,मुझसे रहा न गया और मैंने एक एक कर उसे सुनना शुरू किया .
इत्तेफाक से पहली क्लिप बिपाशा और अमर जी के बीच की मिल गयी जिसमे बुढ़ापे में भी अपनी जवानी पेश करते हुए अमर सिंह सुनने में आये.
आगे बढ़ा तो अनिल अम्बानी जैसी हस्ती भैया जी भैया जी करते हुए अपना काम निकलवाते,और  मीडिया में खबर फैलाने पर शुभाष चन्द्र पर अपना गुस्सा ज़ाहिर करते सुनायी दिये.
इनकी बातो को सुनकर ये समझ में आ रहा था के आज किस तरह राजनीति और व्यापार एक दुसरे का पूरक होता जा रहा है.
चूँकि सुप्रीम कोर्ट ने इस टेप को सुनाने  की इजाज़त दे दी है तो मैंने भी सोचा के अपने दोस्तों और बड़ों के साथ इसे साझा करूँ.
मैंने अपने प्रोफाइल में इसे पोस्ट कर दिया,,,ये वाकया था करीब ११ बजे का.

मगर इस कहानी में नया मोड़ तब आता है जब दूसरों पर थूक फेकने वाले वेबसाइट ने खुद अपने पर हे थूक फेक डाली.
जी हाँ!
करीब २ बजे 
"नवभारत" पर ऊँगली उठाने वाले "मोहल्ला लाइव" ने खुद अपने हे वेबसाइट से मुख्य-मुख्य क्लिप का ख़ास अंश हे ग़ायब कर दिया.
मै ये देखकर सन्न रह गया की ये क्या है????????
हर जगह पोलिटिक्स ने अपना पैर जमा रखा है??
निश्चय ही  उस टेप में अनिल अम्बानी,सुभाष चन्द्र जैसे लोगों का नाम एवं उनकी  अभद्र वाणी थी.मगर सुप्रीम कोर्ट ने भी तो कुछ सोच समझा कर ही इसे सार्वजानिक करने की अनुमति दी.
फिर इसे हटाया  क्यों गया???  
ये सवाल मैंने वहां  मौजूद कमेंट्स में भी पोस्ट किया पर शायद ये सवाल  उन्हें ना-गवार गुजरी,और उन्होंने कमेन्ट पोस्ट भी नहीं किया.
इस पुरे घट्न क्रम में मुझे नयी चीज़ समझ में आयी जिसे मै सभी के साथ शेयर  करना चाहूँगा " कि कभी भी कोई भी सुराग  या सबूत कुछ भी हाथ लगे पहले अपने कब्ज़े में करो फिर आगे कि सोचों"
मेरे ख्याल से शायद इससे मन को संतुष्टि मिलेगी!!!!!!!!