Saturday, 21 May 2011

आंतक पर कारवायी या देश को तमाचा?


हम भारतीय भी कितने मासूम और बेबस हैं.
एक तरफ हम अपने देश से ये उम्मीद लगाये बैठे हैं की वो अमेरिका की तर्ज़ पर अपने दुश्मनों से बदला लेगा,और दूसरी तरफ गृह मंत्रालय नपुंसक की तरह अपनी हे पीठ थपथपाने के लिये पकिस्तान सरकार को आतंकियों की सूँची थमा रही है.
वो काली सूँची भी ऐसी जिसने अपने ही देश का मुहं काला करवा दिया.
आश्चर्य होता है की देश की दो प्रमुख एजेंसी सी.बी.आई और ख़ुफ़िया विभाग ने ऐसी ग़लती कैसे कर दी! वजहुल कमर और फ़िरोज़ खान का नाम उस सूँची में शामिल होना कोई छोटी-मोटी ग़लती नहीं है जिसे कुछ निचले कर्मचारियों के निष्काषित किये जाने पर माफ़ कर दिया जाय.
हम पकिस्तान से क्या उम्मीद लगाये बैठे है की वो वाघा बोर्डर पर उन आतंकियों को लेकर आएगा और हमें सौंपते हुए कहेगा " की लीजिये अपने गुनाहगारों को"
व्यर्थ में वक़्त की बर्बादी.
शायद उन आतंकियों को पकड़ने का वो आधार एक ज़ोरदार ठहाके के साथ पाकिस्तानी कचड़े की शोभा बढ़ा रहा होगा.
क्या हमारे एजेंसी का ये नाकारापन देश में और आतंकियों को कुले सांड की तरह घुमने का शह नहीं देगा?
आंतंकवाद पर कारवायी करने के नाम पर मौन धारण करने वाली ये सरकार ने अभी ऐसा तमाचा देश को मारा है जिसकी गूँज अभी थमने वाली नहीं.

Thursday, 19 May 2011

"वक़्त बदला,हालात बदले और बदला वो बिहार"


कॉलेज में छुट्टी मिली तो इस बार पटना जाने का मौका मिला,आनन-फानन में टिकट लेकर चल पड़ा जाने की ख़ुशी थी ही  साथ साथ मन में एक सवाल  भी उठ रहा था के इस बार क्या बदलाव देखने को मिलेगा?
प्रश्न स्वाभाविक था क्योंकि कुंठित हो चूका बिहार अब विकास की राह पर अग्रसर था.
पटना जं. के बाहर निकला तो नज़ारा ऐसा था मानो मै किसी तीर्थ स्थान पर पहुँच  गया हूँ.मैंने कुछ ज्यादा कह दिया तो माफ़ी चाहूँगा ,मगर महज़ ३०० मीटर के  दायरे में एक भव्य विशाल महाबली हनुमान की मंदिर,एक ऊँची मीनार वाली मस्जिद और अब एक अति सुन्दर बोद्ध मंदिर भी नज़र आये तो कोई भी अचम्भा खा जाए.
ये स्वागत द्वार या यूँ कहे सूचक है  बिहार की एकता और सदभावना का.
किसी ज़माने में जंगल राज कहे जा रहे राज्य की राजधानी की रौनक ही  कुछ और थी.हर तरफ साफ़ सफ़ाई और रौशनी की चकाचौंध आँखों को आकर्षित कर रही थी.
कही कही पर "क्लीन पटना ग्रीन पटना" जैसे स्लोगन भी पढने को मिल रहे थे,हालांकि ये पहले भी लिखे होते थे मगर फर्क सिर्फ इतना था की इस पर पान और गुटके का टीका लगा होता था ताकि नज़र न लगे.

शायद बात हो रही है उस बदलते बिहार की जिसके लिए कुछ साल पहले वक़्त जैसे ठहर सा गया था और वहां  की जनता ने बदलाव की आशा करनी भी छोड़ दी थी ..!
मगर बदलाव लाता  भी तो कौन??
बीबीसी के एक कार्यक्रम में तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से पूछा जाता है कि आप मुख्यमंत्री बन गयी हैं..कैसे संभालेंगी राज्य को???
इस पर उनका जवाब बड़ा शर्मनाक आता है
 "जिस तरह से बचपन में रोटी बनाना और बकरी चराना सीखे थे वैसिये सीख जाएंगे ई भी "
अब ज़रा सोचिये जब राज्य का मुखिया ही ऐसी कुपोषित मानसिकता का आदमी हो जिसे एक राज्य चलाना  और बकरी चराने का अन्तर प्राप्त न हो उससे किसी अच्छे कार्य कि आशा भी करना मुर्खता थी.
कारणवश!
हर तरफ कुशाशन ,बदतमीज़ी ,रंगदारी!
आपकी कार कितनी भी अच्छी क्यों न हो गांधी सेतु पर लाठी दिखाकर हे रोका जाता था,आपके पास ट्रेन में ए .सी का टिकेट क्यों ना हो मगर एक बेटिकट ग्वाला आपके साथ सफ़र का आनंद लेगा,क्यों कि दुसरे दर्जे में गर्मी से उसका दूध जो फट जाता.
बिहार भ्रस्टाचार के ऐसे भवर में फंसता जा रहा था जिससे निकलना अब  नामुमकिन सा लग रहा था.

लेकिन कहते है न कभी न कभी पाप का घड़ा ज़रूर भरता है,शायद वो समय  आ गया था तभी लालू राज का अंत समीप लगने लगा.
और आशाहीन हो चुके बिहार को नितीश कुमार जैसा प्रभावी नेता मिला ,जिन्होंने धर्म और जाती कि राजनीति छोड़ विकास का मुद्दा उठाया .
"वक़्त बदला ,हालात बदले,और बदला सारा बिहार"
हर तरफ विकास कि बातें होने लगी,गाव,शहर में जर्जर हो चुके  सड़कों  का पूर्ण रूप से निर्माण हुआ,जानकार सही कहते हैं के किसी राज्य का पहला आकर्षण उस राज्य का यातायात होता है.
वो बदलाव यहाँ अब देखने को मिल रहा है. .
जो सफ़र टूटी सड़क के कारण ३ घंटे का होता था वो अब महज़ ४५ मिनट में पूरा  किया जा सकता है.
आपके पास अगर गाडी अच्छी हो तो अब १२०-१३० किमी प्रति घंटा की रफ़्तार पाना अब मुक्मिन है,यकीन ना आये तो कभी एन ,एच  ३१ पर आकर देखे.
गावों के बच्चों को मुफ्त कपडे.किताब ,भोजन और यहाँ तक की साईकिल भी दी गयी.जिसका असर अब साफ़ देख जा सकता है,बच्चे अब खुद स्कुल जाना चाहते  हैं.और इससे शिक्षा का स्तर भी बढ़ रहा है 
गावं में बिजली पहुंचाने  के लक्ष्य से एक कदम आगे जाकर इन्टरनेट की सुविधा  मुहैया करायी जा रही है.
बिहार की तरफ उलट कर न देखने वाले व्यापारी अब वहां कारखाना लगा रहे हैं,जिससे वहा रोज़गार को  बढ़ावा मिल रहा है.
कूल मिलाकर कहा जाए तो बेशक यही वो बदलाव है,जिसे देखने के लिए ना जाने कब से यहाँ की आँखे तरस रही थी.
इस सारे कार्य का श्रेय नितीश जी को ही  जाता है जिन्होंने ये बदलाव लाकर एक मिसाल क़ायम की.
काश दुसरे राज्य के नेता  भी धर्म की राजनीती छोड़ विकास की राजनीती का पाठ नितीश से पढ़े तो अपने देश की तस्वीर ही  कुछ अलग होगी.
बस इस वक़्त तो  ज़ेहन में एक बड़े आदमी की कही  बात याद आ रही है जो बिहार आज कह रहा है 
  "जिस तरह रात को चीरता हुआ आता है आफताब,देखने वाले देख कैसे होता है इन्क़लाब"...............!!!!!

Wednesday, 18 May 2011

अमर वार्ता में विष क्यों मिला दिया गया?



एक सुबह जब उठा तो अखबार न मिला ,सोचा इन्टरनेट पर हे खबर पढ़ लूं.
राहुल गाँधी और भट्टा परसौल के हंगामे के इलावा  "मोहल्ला लाइव" वेबसाइट पर नज़र डाली.
पहले ही  पृष्ट पर दो ख़बरों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया.
पहला- नवभारत ने अमर वाणी को अपने ऑनलाइन पृष्ट से हटायी,और दूसरी
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सुनिए एक दलाल नेता की "अमर" वार्ता.

अपने ब्लॉग में अविनाश जी ने बड़े ही रोचक अंदाज़ पुरे टेप की व्याख्या की है,मुझसे रहा न गया और मैंने एक एक कर उसे सुनना शुरू किया .
इत्तेफाक से पहली क्लिप बिपाशा और अमर जी के बीच की मिल गयी जिसमे बुढ़ापे में भी अपनी जवानी पेश करते हुए अमर सिंह सुनने में आये.
आगे बढ़ा तो अनिल अम्बानी जैसी हस्ती भैया जी भैया जी करते हुए अपना काम निकलवाते,और  मीडिया में खबर फैलाने पर शुभाष चन्द्र पर अपना गुस्सा ज़ाहिर करते सुनायी दिये.
इनकी बातो को सुनकर ये समझ में आ रहा था के आज किस तरह राजनीति और व्यापार एक दुसरे का पूरक होता जा रहा है.
चूँकि सुप्रीम कोर्ट ने इस टेप को सुनाने  की इजाज़त दे दी है तो मैंने भी सोचा के अपने दोस्तों और बड़ों के साथ इसे साझा करूँ.
मैंने अपने प्रोफाइल में इसे पोस्ट कर दिया,,,ये वाकया था करीब ११ बजे का.

मगर इस कहानी में नया मोड़ तब आता है जब दूसरों पर थूक फेकने वाले वेबसाइट ने खुद अपने पर हे थूक फेक डाली.
जी हाँ!
करीब २ बजे 
"नवभारत" पर ऊँगली उठाने वाले "मोहल्ला लाइव" ने खुद अपने हे वेबसाइट से मुख्य-मुख्य क्लिप का ख़ास अंश हे ग़ायब कर दिया.
मै ये देखकर सन्न रह गया की ये क्या है????????
हर जगह पोलिटिक्स ने अपना पैर जमा रखा है??
निश्चय ही  उस टेप में अनिल अम्बानी,सुभाष चन्द्र जैसे लोगों का नाम एवं उनकी  अभद्र वाणी थी.मगर सुप्रीम कोर्ट ने भी तो कुछ सोच समझा कर ही इसे सार्वजानिक करने की अनुमति दी.
फिर इसे हटाया  क्यों गया???  
ये सवाल मैंने वहां  मौजूद कमेंट्स में भी पोस्ट किया पर शायद ये सवाल  उन्हें ना-गवार गुजरी,और उन्होंने कमेन्ट पोस्ट भी नहीं किया.
इस पुरे घट्न क्रम में मुझे नयी चीज़ समझ में आयी जिसे मै सभी के साथ शेयर  करना चाहूँगा " कि कभी भी कोई भी सुराग  या सबूत कुछ भी हाथ लगे पहले अपने कब्ज़े में करो फिर आगे कि सोचों"
मेरे ख्याल से शायद इससे मन को संतुष्टि मिलेगी!!!!!!!!